NCERT से क्यों हटा रही है सरकार preamble और secularism जैसे महत्वपूर्ण विषय?

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 हाल ही में एनसीईआरटी (NCERT) की किताबों से संविधान की प्रस्तावना (Preamble) और 'धर्मनिरपेक्षता' (Secularism) से जुड़े कुछ अंशों को हटाए जाने की खबरों ने देश में एक बड़ी बहस छेड़ दी है। एक तरफ जहां इसे शिक्षा के भगवाकरण और संवैधानिक मूल्यों को कम करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसे पाठ्यक्रम को सुसंगत (rationalize) बनाने और छात्रों पर से पढ़ाई का बोझ कम करने की प्रक्रिया बताया जा रहा है।

आइए इस पूरे मुद्दे को एक ब्लॉग स्टाइल में समझते हैं और फिर यूपीएससी (UPSC) के दृष्टिकोण से इसके 4 अलग-अलग एंगल्स का विश्लेषण करते हैं।

क्या वाकई बदल रहा है हमारी किताबों का 'संवैधानिक ताना-बाना'?

सोचिए, आप बचपन से जो नागरिक शास्त्र (Civics) की किताब पढ़ते आ रहे हैं, उसके पहले पन्ने पर छपी 'प्रस्तावना' अचानक गायब हो जाए, या फिर 'धर्मनिरपेक्षता' जैसे बुनियादी शब्द को समझने वाले अध्याय छोटे कर दिए जाएं, तो क्या होगा? सोशल मीडिया से लेकर संसद तक इस समय यही सवाल गूंज रहा है।

मुद्दा क्या है?

आरोप लग रहे हैं कि एनसीईआरटी ने कक्षा 7वीं, 10वीं और 11वीं की राजनीति विज्ञान (Political Science) की किताबों से धर्मनिरपेक्षता और प्रस्तावना के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों को हटा दिया है या उनका महत्व कम कर दिया है। विपक्ष और कई शिक्षाविदों का मानना है कि यह भारत के बहुसांस्कृतिक और धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर चोट है।

एनसीईआरटी का पक्ष क्या है?

एनसीईआरटी का कहना है कि यह कोई राजनीतिक बदलाव नहीं है, बल्कि **'पाठ्यसामग्री का युक्तिकरण' (Content Rationalization)** है। कोरोना काल के बाद से ही छात्रों पर पढ़ाई का मानसिक बोझ कम करने के लिए अध्यायों को छोटा किया जा रहा है। उनका तर्क है कि एक ही चीज़ अलग-अलग कक्षाओं में बार-बार दोहराई जा रही थी, जिसे सिर्फ व्यवस्थित किया गया है।

चाहे तर्क जो भी हो, लेकिन एक जागरूक नागरिक और सिविल सेवा एस्पिरेंट होने के नाते हमारे लिए इस मुद्दे को सिर्फ राजनीतिक चश्मे से देखना काफी नहीं है। हमें इसके गहरे आयामों को समझना होगा।

 UPSC दृष्टिकोण (POV) से 4 अलग-अलग एंगल्स

यूपीएससी मुख्य परीक्षा (विशेषकर GS Paper 2 - Polity & Governance और Essay) के लिहाज से इस मुद्दे को इन 4 महत्वपूर्ण दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है:

1. संवैधानिक और कानूनी एंगल (Constitutional & Legal Angle)

मूल संरचना का सिद्धांत (Basic Structure Doctrine): 1973 के ऐतिहासिक केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद संविधान के 'मूल ढांचे' को नहीं बदल सकती। 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा प्रस्तावना में 'पंथनिरपेक्ष' (Secular) शब्द जोड़ा गया था। एस.आर. बोम्मई मामले (1994) में कोर्ट ने धर्मनिरपेक्षता को मूल ढांचा माना।

 अकादमिक प्रभाव:  यदि स्कूली स्तर पर ही इन शब्दों की व्याख्या या उपस्थिति कम की जाती है, तो भावी पीढ़ी में 'संवैधानिक नैतिकता' (Constitutional Morality) और इसके कानूनी महत्व को लेकर समझ कमजोर हो सकती है। परीक्षा में सवाल आ सकता है कि क्या शैक्षणिक बदलाव संवैधानिक मूल्यों की भावना के अनुरूप हैं?

2. शैक्षणिक और नीतिगत एंगल (Educational & Policy Angle)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020): एनईपी 2020 रटने की संस्कृति को खत्म करके आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking) और भारतीय मूल्यों पर जोर देती है। एनसीईआरटी इसी नीति के तहत बदलाव कर रहा है।

चुनौती:  शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को समाज की वास्तविकताओं और विविधताओं से परिचित कराना है। यदि पाठ्यक्रम में अत्यधिक कटौती की जाती है, तो यह 'अकादमिक स्वतंत्रता' (Academic Freedom) और बहुपक्षीय सोच को प्रभावित कर सकता है। नीतियों के क्रियान्वयन में संतुलन (Balance between reduction of load and core values) पर मुख्य परीक्षा में विश्लेषणात्मक प्रश्न बन सकते हैं।

3. सामाजिक-सांस्कृतिक एंगल (Socio-Cultural Angle)

भारत की विविधता: भारत एक बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक देश है। यहाँ धर्मनिरपेक्षता का मतलब पश्चिमी अवधारणा (धर्म और राज्य का पूर्ण अलगाव) जैसा नहीं है, बल्कि 'सर्वधर्म समभाव' (सभी धर्मों को समान सम्मान) है।

सामाजिक ताना-बाना:  स्कूली पाठ्यक्रम समाज में सहिष्णुता और भाईचारे की नींव रखता है। धर्मनिरपेक्षता जैसे विषयों को कम स्थान मिलने से सामाजिक ध्रुवीकरण या ऐतिहासिक समझ में असंतुलन पैदा होने का खतरा रहता है, जो आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव (GS Paper 1 & 3) के लिए संवेदनशील विषय है।

4. राजनीतिक और प्रशासनिक एंगल (Political & Administrative Angle)

शिक्षा समवर्ती सूची (Concurrent List) में: संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत शिक्षा पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। एनसीईआरटी के इन बदलावों को कई गैर-भाजपा शासित राज्यों ने लागू करने से मना कर दिया है और अपनी खुद की किताबें छापने की बात कही है।

संघवाद पर प्रभाव (Impact on Federalism):  पाठ्यक्रम को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच यह टकराव 'सहकारी संघवाद' (Cooperative Federalism) की भावना को प्रभावित करता है। एक प्रशासक के तौर पर आपको यह समझना होगा कि राष्ट्रीय स्तर पर एक समान शिक्षा नीति और क्षेत्रीय विविधताओं के सम्मान के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

निष्कर्ष (Takeaway): पाठ्यक्रम में बदलाव तकनीकी और प्रशासनिक कारणों (जैसे बोझ कम करना) से हो सकता है, लेकिन यह ध्यान रखना अनिवार्य है कि इस प्रक्रिया में भारत के संवैधानिक आदर्श—न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता—की नींव कमजोर न पड़े।

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